ममता बनर्जी का इस्तीफा न देने का विवाद बढ़ा सियासत का तापमान
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी ने कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगी। उनका कहना था कि वे जनादेश के आधार पर नहीं, बल्कि साजिश की वजह से हारी हैं, इसलिए वे राजभवन जाकर इस्तीफा नहीं देंगी। इस बयान ने राजनीतिक माहौल को तीव्र कर दिया है।
भाजपा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता उज्जवल निकम ने कहा, “देश में पहली बार ऐसा हुआ है कि चुनाव हारने के बाद कोई मुख्यमंत्री पद त्यागने से इनकार कर रहा है। यह स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में गतिरोध पैदा करने का प्रयास है, जिसका कोई वैधानिक आधार नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अश्विनी दुबे ने संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा, “संविधान के तहत जब किसी पार्टी को विधानसभा चुनाव में हार मिलती है तो मौजूदा मुख्यमंत्री को राज्यपाल के समक्ष इस्तीफा देना होता है। फिर राज्यपाल कार्यवाहक सत्ता सौंपते हैं जब तक कि नई विधानसभा गठित न हो जाए। पश्चिम बंगाल की वर्तमान विधानसभा की अवधि 7 मई को समाप्त हो रही है और 8 मई को नई विधानसभा का गठन होगा, जिसके बाद नया मंत्रिमंडल बनना है।”
इस्तीफा न देने पर अधिवक्ता विराग गुप्ता ने कहा कि यदि मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से इस्तीफा नहीं देती हैं तो भी संवैधानिक संकट पैदा नहीं होगा, क्योंकि इस्तीफा लिखित, पत्र के माध्यम या ईमेल से भी दिया जा सकता है। जब वह समुचित प्राधिकारी द्वारा स्वीकार किया जाता है, तब इसका वैध और संवैधानिक प्रभाव होता है।
उन्होंने आगे कहा, “संविधान के अनुच्छेद 172 के अनुसार विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्ष होता है। आपातकाल में यह राष्ट्रपति की मंजूरी से एक साल बढ़ाया जा सकता है। चुनाव समाप्ति के बाद नई विधानसभा का गठन और नया मुख्यमंत्री स्वाभाविक है।”
भाजपा राज्यसभा सदस्य दिनेश शर्मा ने ममता बनर्जी के चुनाव परिणामों पर चुनाव आयोग को दोषी ठहराने के बयान को जिम्मेदारी टालने का प्रयास बताया। भवानीपुर से सुवेंदु अधिकारी द्वारा मिली 15,000 वोटों की स्पष्ट जीत पश्चिम बंगाल के जनता के जनादेश को दर्शाती है।
पश्चिम बंगाल बीजेपी प्रवक्ता देबजीत सरकार ने कहा, “ममता बनर्जी इस्तीफा न देने के दौरान केवल तमाशा कर रही हैं। उनका पद छोड़ना न देना कोई परिणाम नहीं लाएगा।”
भाजपा की विजेता उम्मीदवार रूपा गांगुली ने कहा, “हार को स्वीकार करना हर लोकतंत्र की जिम्मेदारी होती है। इसकी निगरानी राज्यपाल, चुनाव आयोग व संविधान करते हैं।”
त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय ने कहा, “इस्तीफा नहीं देने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। विधानसभा सत्र 8 मई को समाप्त हो जाएगा, उसके बाद वह क्या करेंगी, संभवतः सड़कों पर प्रदर्शन।”
इस प्रकार ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने के फैसले से पश्चिम बंगाल की राजनीति में अस्थिरता और संवैधानिक बहस तेज हो गई है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।