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भगवान के बच्चे: मद्रास उच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के बजाय उन्हें बचकाना क़रार दिया

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May 20, 2026 #source
‘Children of god’: Madras HC infantilises transgender persons rather than speak of their rights

मद्रास उच्च न्यायालय का ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए यथार्थपूर्ण मान्यता की बजाय संरक्षणकारी दृष्टिकोण

मद्रास उच्च न्यायालय ने अप्रैल के अंतिम सप्ताह में एक अपेक्षित जमानत सुनवाई के दौरान ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को “भगवान के बच्चे” कहकर संबोधित किया। यह अभिव्यक्ति दयालु प्रतीत होती है, जो एक हाशिए पर रहने वाले समुदाय की गरिमा बहाल करने का प्रयास है। लेकिन इस भाषा में निष्पक्षता की कमी है और यह भावनात्मक पितृसत्तात्मक मान्यता का पुनरुथान है।

“भगवान के बच्चे” कहने जैसे पद का भारत में एक लंबा इतिहास है, जिसे हम गांधीजी द्वारा जातिगत छुआछूत के शिकार लोगों के लिए प्रयुक्त “हरिजन” शब्द में देख सकते हैं। हरिजन शब्द का उद्देश्य उन लोगों को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करके सामाजिक सम्मान देना था, मगर स्थानीय आलोचकों ने इसे संरचनात्मक समस्याओं की जगह भावात्मक नैतिकता के रूप में खारिज किया।

भारतीय न्यायालय, जब हाशिए पर रहने वाले पहचान समूहों के मामलों से सामना करते हैं, तो अक्सर भावनात्मक और सहानुभूतिपूर्ण भाषा का सहारा लेते हैं। वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट के एनएएलएसए बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों को मान्यता दी गई, जिसमें उल्लेख किया गया कि उन्हें अक्सर जातिगत “अछूत” के समान समझा जाता है। हालांकि यह तुलना शक्तिशाली भले हो, लेकिन निर्णय की विश्लेषणात्मक प्रक्रिया में जाति और लिंग के बीच गहरे अंतर्संबंध की जांच नहीं की गई।

मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा “भगवान के बच्चे” के रूपक का उपयोग सामाजिक रूपक से हटकर एक अधिक संरक्षणवादी और बचकाना दृष्टिकोण दर्शाता है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के बजाय उनकी रक्षा करने पर अधिक केंद्रित है। इस स्वरूप की भाषा उचित संवैधानिक विमर्श और समानता के लिए किए गए संघर्षों को कमजोर करती है।

ट्रांसजेंडर समुदाय को सम्मान, स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की लड़ाई में शामिल करते हुए, न्यायालयों को संवेगपूर्ण भाषा के बजाय ठोस और संरचनात्मक सुधारों पर ध्यान देना चाहिए। समाज और न्यायपालिका का यह कर्तव्य है कि वे संबंधित समुदाय की स्वतंत्रता, स्वायत्तता और गरिमा को प्रभावी ढंग से बढ़ावा दें।

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Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)