विरोधी दलों के नगर क्षेत्रों को निशाना बनाता सीमांकन विधेयक: एक विश्लेषण
भारतीय संसदीय क्षेत्र सीमाओं के पुन: निर्धारण, जिसे सीमांकन कहा जाता है, राजनीतिक लोकतंत्र की आधारशिला है। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा प्रस्तुत होने वाला सीमांकन विधेयक, लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखता है। इसका उद्देश्य राज्यों के जनगणना के आंकड़ों के आधार पर विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों का पुन: वितरण करना है, लेकिन इसके प्रभाव को लेकर राजनीतिक तकरार चरम पर है। अभी तक केवल असम और जम्मू-कश्मीर में सीमांकन प्रक्रिया पूरी हुई है, जहाँ इस विधिवत अभ्यास ने पक्षपातपूर्णम सोच को उजागर किया है, जो अन्य स्थानों पर भी लागू हो सकता है।जनसंख्या के चयनात्मक उपयोग की रणनीति
जम्मू-कश्मीर में जनसांख्यिकीय आंकड़ों का इस्तेमाल मुस्लिम बहुल कश्मीर क्षेत्र की सीटों को कम और हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र की सीटों को बढ़ाने के लिए किया गया। उदाहरण के लिए, अनंतनाग लोकसभा क्षेत्र की जनसंख्या कम कर मुस्लिम बहुल हिस्से जम्मू में शामिल किए गए, जबकि इनके बीच पूरी पिर पंजाल पर्वत श्रृंखला स्थित है। असम में भी इसी प्रकार मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की सीटें घटाई गईं। सरकार इस मॉडल को सीमांकन विधेयक में अपनाकर विभिन्न राज्यों के बीच सीटों का पुन: वितरण करने जा रही है, जिससे मुख्यतः दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी घटेगी।‘‘नक्शा’’ पलटने की राजनीति: सीटों का गेरिमैंडरिंग
लोकतंत्र का मूल नियम ‘‘एक व्यक्ति, एक वोट’’ है। इसके तहत हर विधानसभा क्षेत्र में लगभग समान संख्या में मतदाता होने चाहिए। लेकिन असम के मुस्लिम बहुल धुबरी क्षेत्र में सामान्य से 10 लाख ज्यादा मतदाता जोड़े गए, जिससे वहां के मत की प्रभावशीलता घट गई। यह वोटर बैरपेटा क्षेत्र से ‘‘स्थानांतरित’’ किए गए, जो अचानक हिंदू बहुल सीट बन गया। चुनाव में एनडीए ने इस सीट पर पहली बार जीत हासिल की। गेरिमैंडरिंग, जिसका उद्गम अमेरिका में हुआ, चुनावी क्षेत्र की सीमाओं को इस तरह तोड़-मरोड़ कर बनाना है, जिससे एक पक्ष को अनुचित लाभ प्राप्त हो। असम के सीमांकन में यह रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है, जहां विपक्षी मतदाताओं को ऐसे क्षेत्रों में ‘पैक’ किया जाता है जहां वे बड़ी संख्या में जीतते हैं, लेकिन बाकी जगह उनकी ताकत कमजोर हो जाती है। इसी तरह ‘क्रैकिंग’ के माध्यम से विपक्षी मतदाताओं को छोटे-छोटे क्षेत्रों में बंटा दिया जाता है ताकि उनका प्रभाव सीमित हो जाए।सीमांकन एक तीन-चरणीय वोट चोरी
सीमांकन विधेयक विपक्ष के खिलाफ तीन चरणों में वोट चोरी का काम करता है।- दक्षिणी राज्यों की सीटों की संख्या में कटौती, जो परिवार नियोजन के बेहतर प्रयासों के चलते जनसंख्या में तेजी से वृद्धि नहीं हुई है। ये क्षेत्र भाजपा के लिए कमजोर क्षेत्र हैं।
- जनसंख्या आंकड़ों के चयन में पक्षपात। असम में सरकार ने 2001 के जनगणना आंकड़ों को आधार बनाया, न कि ताजा आंकड़े, जिससे भाजपा समर्थक अल्पसंख्यक समुदायों को संरक्षण मिला। जबकि दक्षिण और पंजाब जैसे इलाकों की सच्ची स्थिति को नजरअंदाज किया गया।
- गेरिमैंडरिंग द्वारा विपक्ष के मतदाताओं को कुछ सीमित क्षेत्रों में केंद्रित करना और व्यापक रूप से प्रभावहीन करना।

