नियमित शारीरिक गतिविधि का महत्त्व: निष्क्रियता के दुष्प्रभाव और समाधान
आधुनिक जीवनशैली में शारीरिक निष्क्रियता यानी शरीर की ठीक से सक्रियता की कमी बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, नियमित और उपयुक्त शारीरिक गतिविधि न केवल मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है, बल्कि विभिन्न रोगों से बचाव और जीवन प्रत्याशा बढ़ाने में भी सहायक है।
WHO के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, वयस्कों को प्रति सप्ताह कम से कम 150 मिनट मध्यम सक्रियता (जैसे तेज चलना, आसान साइकल चलाना) या 75 मिनट तीव्र सक्रियता (जैसे दौड़ना, टेनिस) करनी चाहिए, साथ ही कम से कम दो बार मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम भी शामिल होने चाहिए। बावजूद इसके, विश्व स्तर पर केवल 73% वयस्क इन सुझावों का पालन करते हैं, जबकि कनाडा में 51% वयस्क शारीरिक रूप से निष्क्रिय माने जाते हैं।
मैं, साइमन फ्रेजर विश्वविद्यालय में हेल्थ साइंसेज का प्रोफेसर, स्वास्थ्य एवं रोग से जुड़े व्यवहारों का अध्ययन करता हूँ और इसके महत्व पर एक ब्लॉग भी लिखता हूँ।
शारीरिक निष्क्रियता क्या है?
शारीरिक निष्क्रियता का अर्थ है ये न्यूनतम गतिविधि दिशानिर्देशों को पूरा न करना। निष्क्रिय होने का मतलब यह नहीं कि कोई शारीरिक गतिविधि नहीं कर रहे, बल्कि यह हो सकता है कि हल्की गतिविधियां जैसे सामान्य चलना या घरेलू काम करना हो परन्तु मध्यम या तीव्र गतिविधि नहीं। निष्क्रियता से अधिकांश समय शारीरिक तौर पर बैठना या स्थिर रहना शामिल होता है।
स्थिर गतिविधियाँ वे हैं जिनमें बहुत कम या कोई गति नहीं होती, जैसे बैठना, लेटना या खड़ा रहना। अधिकांश लोगों का अधिकतर स्थिर समय बैठकर बिताया जाता है। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि वयस्क औसतन प्रतिदिन लगभग छह घंटे बैठते हैं। हालांकि, ये अध्ययन आत्म-रिपोर्ट पर आधारित होते हैं। कुछ ऐसे शोध भी हैं जिनमें सीधे मापन किया गया है…
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